मंगलवार, 25 मई 2010

प्रेमी के घर पहुंची प्रेमिका, मंदिर में रचाई शादी

May 26,2010
मिर्जामुराद (वाराणसी)। राजातालाब स्थित विश्वकर्मा मंदिर में मंगलवार की दोपहर सुरेरी (जौनपुर) निवासिनी प्रेमिका ने प्रेमी के साथ जबरिया शादी कर ली। शादी के लिए वह प्रेमी को घर से ले गई थी। शादी कर दोनों कचहरी में नोटरी कराने पहुंच गए। इस दौरान युवती के परिजन युवक को उठा ले गए। बताते है कि गांव स्थित प्रजापति बस्ती निवासी एक युवक गुजरात में रहकर पावरलूम चलाता रहा। इसी बीच पड़ोस में रहने वाली सुरेरी (जौनपुर) निवसिनी युवती संग उसका प्रेम-प्रपंच शुरू हो गया। युवक के परिजनों ने घटना की सूचना पुलिस को दी। मामला जौनपुर का होने के चलते पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की।

चिड़िया की जान जाए बच्चों का खिलौना

बिहार को अगर हम मुहावरों और कहावतों की भूमि कहें तो गलत नहीं होगा.भारत की हृदयस्थली बिहार में यह कहावत न जाने कितने सालों से प्रचलित है.हालांकि यह अलग सन्दर्भ में कही गई है लेकिन यह हमारे देश में लगातार बढती महंगाई से पीड़ित जनता की हालत पर एकदम सटीक बैठती है.अमीर वर्ग को तो महंगाई से कोई फर्क पड़ता नहीं क्योंकि अमीर तो और भी अमीर होते जा रहे हैं लेकिन महंगाई ने निश्चित रूप से मध्यम और गरीब वर्ग का जीना मुहाल कर रखा है.गरीब तो जैसे दाल और सब्जी का स्वाद ही भूलते जा रहे हैं.मध्यम वर्ग की हालत भी कोई कम पतली नहीं है.बच्चों की फ़ीस से लेकर ट्रांसपोर्टेशन तक हर चीज का खर्च बढ़ता जा रहा है और वेतन है कि जस-का-तस है.बच्चों पर व्यय में कटौती तो की नहीं जा सकती इसलिए समझौता बड़े लोगों को ही करना पड़ रहा है.जी.डी.पी. में अप्रत्याशित वृद्धि के प्रयास में लगीं पिछले २० सालों में देश पर शासन करनेवाली सभी सरकारें यह भूल गईं कि खाद्य-सुरक्षा को बनाये रखने के लिए कृषि-उत्पादन में वृद्धि को जनसंख्या-वृद्धि के अनुपात में बनाई रखनी जरूरी है.मैं सेवा-क्षेत्र का विरोधी नहीं हूँ लेकिन सेवा क्षेत्र रूपया दे सकता है डालर दे सकता है जी.डी.पी. में तेज बढ़ोतरी दे सकता है अनाज नहीं दे सकता उसके लिए तो खेती की ही जरूरत होगी.एक तरफ तो सरकार एक बात पर गर्व का अनुभव कर रही है कि वैश्विक मंदी के बुरे दौर में भी उसने विकास दर में कमी नहीं आने दी वहीँ दूसरी तरफ वित्त मंत्री अच्छी उपज के लिए इन्द्र भगवान का मुंह तक रहे हैं.जिस तरह आज नदियों और नहरों में पानी नहीं है और जिस तरह नलकूपों के द्वारा बेतहाशा दोहन के चलते भूमिगत जल में खतरनाक स्तर तक कमी आ गई है उससे साफ तौर पर कहा जा सकता है कि पिछले ६०-७० सालों में हमने जो सिंचाई नीति अपनाई थी और खेतों को सिंचित करने में जो बेशुमार धन खर्च किया सब बेकार था.अब भी कुछ बिगड़ा नहीं है सरकार को चाहिए कि मनरेगा के तहत दी जानेवाली राशि में से कुछ को वह नए तालाबों, आहरों और कुओं को खोदने और पुराने का पुनरुद्धार पर खर्च करे.इस साल भी अभी तक मानसून की हालत अच्छी नहीं है और तापमान रोज नए-नए रिकार्ड बनाने में लगा हुआ है.ऐसे में बहुत से इलाकों में तो पीने के पानी का संकट भी पैदा हो गया है.सरकार को यह समझ लेना चाहिए कि बजट और राजस्व घाटा को कम करने के लिए यह वक़्त मुफीद नहीं है.ऐसे प्रयासों से महंगाई और भी बढ़ेगी और जनता कम व्यय करने को बाध्य होगी जिससे पूरी अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ेगा.पिछले साल के मुकाबले इस साल गेहूं की सरकारी खरीद में २ प्रतिशत की कमी आई है यानी गेंहूँ खरीद में निजी हिस्सेदारी बढ़ गई है.ऐसे में जब देश की खाद्य सुरक्षा को खतरा बढ़ता जा रहा है सरकारी खरीद में कमी आना कोई अच्छा संकेत नहीं है.क्या सरकार देश में अकाल की कृत्रिम स्थिति को बढ़ावा देना चाहती है जैसा कि चालीस के दशक में बंगाल में देखने को मिला था?दुर्भाग्यवश हमारे नेता भी अमीर वर्ग में शामिल हैं भले ही पहले वे गरीब रहे हों इसलिए तो सरकार धड़ल्ले से पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़ा रही और कृषि सब्सिडी में कमी ला रही है.लेकिन जनता जब तक शांत है तभी तक उसके पेट के साथ सरकार खिलवाड़ कर सकती है जैसे ही उसके सब्र का पैमाना छलकने लगेगा सरकार का कहीं अता-पता तक नहीं होगा.

हो चुकी है समाज के विघटन की शुरुआत

क्या आप बिल क्लिंटन की जाति जानते हैं? ब्लादिमीर पुतिन किस जाति के हैं, या जापानी प्रधानमन्त्री किस जाति का प्रतिनिधित्व करते हैं?, शायद नहीं, और संभवतःयही कारण है कि जिन देशों का यह नेता प्रतिनिधित्व करते हैं वे आज तरक्की कि दौड में हमसे कोसों आगे हैं. सफल लोकतंत्र में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण शर्त है आगे की ओर देखना. भारत को आज भी जब तेजी से विकसित हो रहे देशों की श्रेणी में शुमार किया जाता है तब मन में यह कसक टीस बन कर परेशान कर देती है कि आखिर कब तक हम इस दौड में महज़ एक नंबर बनकर दौड़ते रहेंगे? इसके पीछे शायद कारण यह भी है कि हम चार कदम आगे बढ़कर अपनी पुरातन रवायतों के भ्रम जाल में फिर दो कदम पीछे हट जाते हैं. इस वक़्त देश में जाति आधारित जनगणना पर बहस चल रही है. एक ओर तो हम अपनी अखण्डता के किस्से सुनाते-सुनाते नहीं अघाते, वहीँ दूसरी तरफ अतीत की बुराइयों को भी ‘बंदरिया के मृत बच्चे’ की तरह अपने सीने से चिपटाए रहते हैं. कुछ नेताओं के ऐसे प्रयास भारत के मज़बूत नागरिक समाज को दीमक की तरह खोखला कर रहे हैं. भारत की सांस्कृतिक एकता धुर देहात तक नज़र आती है, मगर यह कोई नहीं सोच-समझ रहा कि अपने राजनीतिक निहितार्थों के लिए कुछ क्षेत्रीय ताकतें अपना वज़ूद बचाने के लिए जाति-जनगणना का दाँव खेल रहे हैं.अंग्रेज़ों की फूट डालो, राज करो की नीति के मुरीद ये नेता अपने राजनीतिक स्वार्थों की खातिर समाज को बांटने का षड़यंत्र रच चुके हैं.
भारत आज विश्व का एकमात्र ऐसा देश बन चुका है जहां सबसे ज़्यादा आरक्षण है. यह समाज के विघटन की शुरुआत है. जाति कोई आपत्तिजनक बात नहीं है, मगर इसका राजनीतिक दोहन किया जाना भी कोई सम्मानजनक या राष्ट्रीय गर्व का विषय नहीं हो सकता. आज जाति आधारित जनगणना की बात चल रही है, कल विवाहों पर नियंत्रण की बात उठेगी, इसके बाद प्रेम विवाहों का नंबर भी आ सकता है. आखिर असली ताक़त आम आदमी के हाथों में कहाँ है? इस तरह की जनगणना के बाद सरकार पर आरक्षित वर्गों के लिए ज़्यादा सुविधाओं, धन की मांगें तेज़ हो जायेंगी. सामान्य वर्गों के लिए वैसे भी सरकारी क्षेत्र में कोई काम नहीं बचा है. इस बात पर भी गौर करना होगा कि सरकार हर साल आरक्षित वर्गों के लिए अरबों रूपये की योजनाएं संचालित करती है, मगर उन्नयन तो दूर गरीब-पिछड़े वर्ग की जनसंख्या आनुपातिक स्तर पर काफी बढ़ रही है. सरकार का यह दावा उसे कितना पंगु और जनता को बेवकूफ समझने वाला है कि “आज़ादी के बाद से अनुसूचित जातियों-जनजातियों को छोडकर किसी भी जाति के सवाल को नीतिगत फैसलों के तहत शामिल नहीं किया गया था.” इस बात का कोई जवाब नहीं दिया जा रहा कि आखिर अचानक इसकी ज़रूरत कैसे आन पड़ी.? यह भी सत्य है कि जाति-जनगणना से विभाजनकारी ताक़तें ज्यादा मज़बूत होकर उभरेंगी, इस तरफ से सरकार ने आँखें मूँद रखी है. सोते व्यक्ति को जगाना आसान होता है, मगर सोने का नाटक करने वाले को कोई नहीं जगा सकता. जनता जाग तो रही है, मगर उस निरीह पशु की तरह जिसको दुह कर पुनः खूंटे से बाँध दिया जाता है, वोट छीन लिया गया है, अब तो हाथों में तोते भी नहीं बचे.

मंगलवार, 27 अप्रैल 2010